कांस्टेबल से राजस्थान के मुख्यमंत्री बनने वाले भैरो सिंह !

दिग्गज समाजवादी नेता मधु लिमये शहर में थे. क्योंकि चुनाव थे. दो बड़े चुनाव हो चुके थे. पहला लोकसभा का. जिसमें इंदिरा हारीं. विपक्षी पार्टियों का नया संयुक्त परिवार अर्थात जनता पार्टी जीती. और मोरार जी देसाई पीएम बने. फिर देसाई के एक कदम के चलते दूसरे चुनाव हुए. मोरार जी ने कहा, कांग्रेस की राज्य सरकारें भी शासन का नैतिक अधिकार खो चुकी हैं. नौ राज्यों में इसके चलते जून 1977 में मध्यावधि चुनाव हुए. सबमें कांग्रेस खेत रही. राजस्थान समेत ज्यादातर राज्यों में जनता पार्टी जीती. अब बारी आई तीसरे चुनाव की. विधायक दल के नेता का चुनाव. राजस्थान में कुल विधायकी सीटें थीं, 200. इसमें जनता पार्टी के विधायक थे 152 और इन्हें ही चुनना था अपना नेता. जो होता सूबे का सीएम. इसके लिए दावेदार थे दो. पर पार्टी में धड़े थे तीन. पहले तीन धड़ों के सरों से मिलिए.
1 सीकर के भैरो सिंह शेखावत. जनता पार्टी के जनसंघ गुट के नेता. सीएम के दावेदार.

2 भरतपुर के मास्टर आदित्येंद्र. जनता पार्टी के कांग्रेस ओ (संगठन) धड़े के नेता. ये भी सीएम के दावेदार.

अब दावेदार थे, तो जरा इनके बारे में भी जान लीजिए. आजादी के आंदोलन में कई बार जेल गए थे मास्टर जी. 1953-54 में कंग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे. फिर इंदिरा और सिंडीकेट के झगड़े में ये बुजुर्ग बुर्जुगों के साथ गया. यानी कांग्रेस ओ का नेता हो गया. मास्टर का सीएम दावा तीन पहलुओं से मजबूत था. पहला, वह जनता पार्टी विधायक दल के सबसे बुजुर्ग, सबसे अनुभवी विधायक थे. दूसरा, भैरो सिंह तो राज्यसभा सांसद थे. विधायकी लड़े ही नहीं थे. फिर वह कैसे नेता हो सकते थे. तीसरा, जनसंघ धड़ा, अपने दम पर बहुमत नहीं जुटा सकता था. और इसी तीसरे बिंदु पर तीसरे धड़े की एंट्री होती है.
चुरु के सांसद महोदय, दौलत राम सारण. लोकदल ( चौधऱी चरण सिंह वाला गुट) धड़े के नेता. सारण ने बड़े चौधरी से सलाह की और मास्टर को न कह दी. मगर मास्टर आदित्येंद्र चुनाव पर अड़े रहे. हुई फिर वोटिंग. गिने गए 152 वोट. मास्टर को मिले सिर्फ 42. बाकी 110 बाबोसा के पाले में. मधु लिमय नतीजों के बाद भी नहीं मुस्कुरा रहे थे. उन्हें नहीं पता था कि मास्टर अपनी हार को कैसे लेंगे. उधर दिल्ली में बैठे प्रधानमंत्री, गृह मंत्री समेत सरकार और चंद्रशेखर समेत जनता पार्टी जयपुर पर नजरें गड़ाए थी. तभी मधु की नजर भैरो की तरफ जाती है. जो अपनी जीत के ऐलान के बाद समर्थकों को छोड़ मास्टर की तरफ लपके. और फिर उनके पैर छू लिए. मास्टर ने भी हाथ उठा दिया. संकट टल गया. मधु मुस्कुराए. दिल्ली भी. शेखावत शातिर थे. जानते थे मास्टर बाहर रहे तो ज्यादा दिक करेंगे. सो उन्हें अपनी सरकार में वित्त मंत्री बना दिया. कहने को बड़ा पद, मगर राजनीतिक रूप से सिर्फ धप्पा.

भैरो सिंह शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री बन गए. मास्टर को अपना वित्त मंत्री बनाया.
अब आप एक सवाल पूछ सकते हैं. बड़े चौधरी ने बाबोसा के पक्ष में वोटिंग के लिए क्यों कहा. दरअसल विधानसभा चुनाव के दौरान जनता दल के लोकदल धड़े और जनसंघ धड़े के बीच गुप्त समझौता हो गया था. इसके हिसाब से चुनाव जीतने की स्थिति में उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा में जनसंघ धड़ा लोकदल धड़े के मुख्यमंत्री उम्मीदवार का समर्थन करेगा. बदले में राजस्थान, मध्यप्रदेश और हिमाचल में लोकदल धड़ा जनसंघ धड़े का मुख्यमंत्री चुनने में मदद करेगा. और ऐसा ही हुआ भी. यूपी में रामनरेश यादव, बिहार में कर्पूरी ठाकुर, हरियाणा में चौधरी देवीलाल सीएम बने. वहीं जनसंघ कोटे से हिमाचल में शांता कुमार, मध्य प्रदेश में कैलाश जोशी और राजस्थान में भैरो सिंह का नंबर लगा.
ये भैरो सिंह की शीर्ष पर शुरुआत थी. मुख्यमंत्री वह तीन बार बने. तीनों बार उनकी अपनी पार्टी या गुट बहुमत से कम था. मगर तीनों ही बार उनका पॉलिटिकल मैनेजमेंट लासानी सिद्ध हुआ. मगर शुरुआत ऐसी नहीं थी. हालात का मिसमैनजमेंट और गुस्से का मिसकैलकुलेशन भैरो सिंह को अड़ंगी मार चुका था. पर ये 77 से तीस बरस पीछे लौटने पर पता चल पाता.
अंक 2 पुरोहित की नाराजगी और नौकरी से इस्तीफ़ा

“आप पुलिस की नौकरी में थे, पॉलिटिक्स में क्यों आ गए? कहते हैं कि कोई इंक्वायरी थी जिसकी वजह से आपको पुलिस की नौकरी छोड़नी पड़ी.”

ये सवाल था. राजीव शुक्ल का. उस समय टीवी पत्रकार. सामने बैठे थे राजस्थान के तीसरी बार सीएम बनकर अपनी आधी पारी खुल चुके भैरो सिंह. जिक्र था भैरो सिंह के पुलिस की नौकरी से इस्तीफे का. उस समय के हिसाब से 50 साल पुरानी बात इस पर पहले भैरो सिंह का जवाब सुनिए. यह बात पूरी तरह से झूठ है. मेरे खिलाफ कोई इंक्वायरी नहीं थी. सिर्फ परिवार के हालात ऐसे थे कि नौकरी छोड़कर खेती की तरफ मुड़ना पड़ा. और अब हमारी सुनिए. जो सुनाई भैरो सिंह के बेहद खास आदमी ने. लेकिन पहचान उजागह न करने की शर्त पर.

Bhairon Singh Shekhawat, Maharaja Gaj Singh(Together)
सियासत में आने से पहले भैरो सिंह शेखावत पुलिस में थे.
बात 1947 की है. भारत आजाद हो चुका था, मगर सब रियासतें अभी यूनियन का हिस्सा नहीं बनी थीं. सीकर रियासत का भी ऐसा ही हाल था. यहां अब भी रावराजा कल्याण सिंह का राज चला करता था. शहर में एक हरदयाल टॉकीज थी. इसके मालिक थे रियासत के पुरोहित जी. एक रोज सीकर पुलिस के चार-पांच अफसर यहां सिनेमा देखने पहुंचे. इनमें अहम चार थे, भवानी सिंह खुड़ी, फतेह सिंह शेखावत, बलवंतदान कविया और भैरो सिंह शेखावत. अफसरों का सिनेमा हॉल के मैनेजर से झगड़ा हो गया. एक पुलिस वाले ने मैनेजर को झापड़ रसीद कर दिया. शिकायत पुरोहित के मार्फत रावराजा कल्याण सिंह तक पहुंची.

रावराजा कल्याण सिंह के सिनेमा हाल में झगड़े के बाद भैरो सिंह शेखावत को पुलिस की नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा था.
रावराजा कल्याण सिंह के सिनेमा हाल में झगड़े के बाद भैरो सिंह शेखावत को पुलिस की नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा था.
उस दौर में रावराजा के बाद रियासत के पुरोहित प्रोटोकॉल के हिसाब से दूसरे सबसे बड़े अधिकारी हुआ करते थे. इसलिए जब उनकी शिकायत आई तो रावराजा ने सीकर एसपी जय सिंह को तलब कर लिया. फिर एसपी ने इन पांचों को तलब किया. अब विकल्प थे दो. या तो नौकरी छोड़ो, वर्ना दफा 323 का मुकदमा भुगतो. भैरो सिंह समेत पांचों ने इस्तीफा लिख दिया. बाकी चार की अपनी कहानी. हम आगे बढ़ते हैं भैरो की चली डगर पर. जहां 10 रुपये के धनबल से शुरू की नेतागीरी और विधायकी हमारा इंतजार कर रही है.

अंक 3 पहला चुनाव, पहली जीत

पुलिस की नौकरी छूटी तो भैरो सिंह खेती करने लगे. घर में दस और भाई-बहन थे. इसमें से एक थे बिशन सिंह. छोटे भ्राता. जो सीकर में पढ़ाई पूरी कर रहे थे. कल्याण हाई स्कूल से. यहीं बिशन संघ से जुड़े. फिर 1951 में स्कूल टीचर हो गए. तभी एक रोज एक पुराना परिचित उनके घर आया. उसका नाम था- लाल कृष्ण आडवाणी.

आडवाणी (बाएं) ने भैरो सिंह के भाई बिशन सिंह को चुनाव लड़ने को कहा. बिशन सिंह ने मना कर दिया और फिर जीत के साथ सियासत में एंट्री हुई भैरो सिंह शेखावत की.
कराची के आडवाणी बंटवारे के बाद राजस्थान में जनसंघ का काम देख रहे थे. बतौर सहमंत्री तब वह जयपुर के चौड़ा रास्ता वाले दफ्तर में रहते थे. पचास का दशक शुरू होने पर काम बहुत बढ़ गया. 1952 में पूरे देश में चुनाव होने थे. राजस्थान में जनसंघ खुद को मजबूत पा रहा था. क्योंकि जागीरदार यहां कांग्रेस का विरोध कर रहे थे. मगर विरोध और समर्थन के बीच कैंडिडेट भी तलाशने थे. और सीकर के लिए यही तलाश लालजी को बिशन की देहरी पर ले गई थी. जनसंघ उन्हें सीकर जिले की दाता-रामगढ़ सीट ले लड़ाना चाहता था. पर बिशन सिंह नहीं माने. बोले. मेरी नई नई नौकरी है. मेरे भाई को लड़ा दो. अपने गांव खाचरियावास में खेत में अड़ी जमाए भाई भैरो सिंह को खबर कर दी गई.

भैरो सिंह पत्नी से 10 रुपये का नोट लेकर निकले और चुनाव जीतकर लौटे.
अब वह सीकर जाने को थे. मगर सौदा करने नहीं जा रहे थे. चुनाव लड़ना था. पर खलीते में तो कुछ नहीं था. पहुंचे पत्नी सूरज कंवर के पास. भैरो को पता था. लुगाई गाढ़े बखत के लिए जोड़कर रखती थी कुछ. सूरज कुंवर ने भैरो को निराश नहीं किया. एक मुड़ा तुड़ा दस का नोट पकड़ा दिया. और जनता ने उन्हें अपना वोट पकड़ा दिया. मगर तब आज की तरह एक ही दिन सब वोट नहीं गिर जाते थे. आजाद भारत का पहला चुनाव था. इसमें हर दिन मतदान पार्टी नए गांवों में जाती और लोगों को बताती. ऐसे वोट डालो. वोट एक महीने तक पड़ते. जाहिर है चुनाव के साथ साथ प्रचार भी चलता रहता. भैरो सिंह को उन दिनों पार्टी की तरफ से किराए की एक स्टेशन वैगन मिली थी. मगर वैगन चलाने के लिए सड़कें भी चाहिए, जो ज्यादातर जगह नहीं थी. ऐसे में शेखावत का ज्यादातर प्रचार ऊंट पर बैठकर हुआ.

फिर ऊंट के एक करवट बैठने का वक्त आया. दाता रामगढ़ में त्रिकोणीय मुकाबला था. नतीजा आया तो तीसरे पर रहे कृषिकार लोक परिषद के रघुनाथ, मिले 5,334 वोट. दूसरे पर रहे कांग्रेस के विद्याधर, मिले 7,139 वोट. और विधायक बने जनसंघ के भैरो सिंह. उन्हें मिले 9,9972 वोट.

हारे तो बैक टु बैक हारे, बैरी के घर जाकर हारे

1952 में पहली विधानसभा में चुने जाने के बाद भैरो सिंह शेखावत की जीत का सिलसिला अगले तीन चुनावों में बदस्तूर जारी रहा. इस दौरान खास बात यह रही कि वो हर चुनाव में अपनी सीट बदल लेते थे. 1957 में वो सीकर की श्रीमाधवपुर सीट से चुनकर आए. 1962 और 1967 में उन्हें जयपुर की किशनपोल सीट से विधायक चुना गया.1972 में वह जयपुर की गांधी नगर सीट से मैदान में थे.

1971 में पाकिस्तान को हराने के बाद इंदिरा गांधी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी.
पर ये साल दूसरा था. इंदिरा पाकिस्तान को हराकर लोकप्रियता के चरम पर थीं. इसी वक्त राजस्थान में चुनाव हुए. गांधीनगर की सीट पर कांग्रेस कैंडिडेट थे जनार्दन सिंह गहलोत. उन दिनों का एक वाकया पढ़िए. सब समझ जाएंगे कि आगे क्या हुआ. भैरो सिंह प्रचार कर रहे थे. कुछ ही महीने पहले भी वह प्रचार कर रहे थे. तब किशनपोल के विधायक थे, मगर प्रचार कर रहे थे बाड़मेर में. खुद अपने लिए. लोकसभा के लिए. पर हार गए. किससे. कांग्रेस के अमृत नाहटा से. ये नाम कुछ सुना लग रहा है क्या. किस्सा कुर्सी का. बतौर प्रॉड्यूसर नाहटा की फिल्म थी. जिसमें संजय-इंदिरा का घुमाकर मजाक उड़ा था. फिर संजय के चेलों ने फिल्म के प्रिंट ही उड़ा दिए. सरकार बदली तो मुकदमा चला. और संजय एक महीने तिहाड़ में रहे किस्सा कुर्सी का फिल्म के प्रिंट जलवाने के इल्जाम में.

इस फिल्म के प्रिंट जलवाने के आरोप में संजय एक महीने तक जेल में रहे.
विषयांतर से वापस विषय पर, शेखावत पर लौटते हैं. 71 के लोकसभा चुनाव के बाद बाद से हालात ज्यादा बदले नहीं थे. भैरो की हालत नई विधानसभा में भी पतली थी. इन्हीं सबके बीच वह एक शाम वोट मांगते हुए अपने विरोधी जनार्दन के घर पहुंच गए. चाय पीने, हंसी ठठ्ठा करने. और वोट मांगने. भैरो ने जनार्दन के माता पिता के पैर छुए. बैठे. तब तक जनार्दन भी खबर पाकर आ गए. आधेक घंटे बाद भैरो उठे. चलने को. फिर हंसे. पलटे. और जनार्दन से बोले.

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