सब मुख्यमंत्री बनने के लिए लड़ रहे हैं

चौधरी देवीलाल के बेटे ओम प्रकाश चौटाला 1999 से 2005 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे थे. कहते हैं कि उनकी पार्टी और प्रशासन पर पकड़ इतनी गजब थी कि उनकी मर्जी के बिना हरियाणा में पत्ता भी नहीं हिलता था. पत्रकारिता में एक शब्द होता है ‘ऑफ दी रिकॉर्ड’. हम पत्रकारों की चक्कलस का प्रस्थान बिंदु. पुराने पत्रकारों के पास ओम प्रकाश चौटाला के अड़ियल रवैये और निर्मम राजनीति के दर्जनों किस्से मौजूद हैं. समय अपने हिसाब से काम करता है. 2005 में ओम प्रकाश चौटाला का कार्यकाल खत्म हुआ और मार्च के महीने में नए सिरे से चुनाव रखे गए.

ओम प्रकाश चौटाला जींद जिले की नरवाणा सीट से मैदान में थे. उनके सामने थे 38 साल के नौजवान उम्मीदवार रणदीप सिंह सुरजेवाला. यह इन दोनों के बीच चौथा मुकाबला था. 1993 में महज 26 साल की उम्र में वो ओम प्रकाश चौटाला के खिलाफ पहला चुनाव लड़े थे. जींद की नरवाणा सीट पर उप चुनाव था. हरियाणा कांग्रेस के कद्दावर नेता शमशेर सिंह सुरजेवाला ने अपने बेटे को ताऊ देवीलाल के बेटे के खिलाफ मैदान में उतार दिया था. उस समय लोगों के बीच रणदीप की पहचान ‘शमशेर का छोरा’ की थी. यह मुकाबला वो हार गए थे. इसके तीन साल बाद रणदीप ने सूबे की राजनीति के हैवीवेट ओम प्रकाश चौटाला को नरवाणा के मैदान में धूल चटा दी थी. साल 2000 के विधानसभा चुनाव में ओम प्रकाश चौटाला ने अपनी हार का बदला ले लिया. रणदीप सिंह सुरजेवाला को 2,194 के मार्जिन से हार का सामना करना पड़ा.

2005 का विधानसभा चुनाव खास था. ओम प्रकाश चौटाला सूबे के मुख्यमंत्री थे. रणदीप उन्हें एक बार फिर चुनौती दे रहे थे. नरवाणा का मैदान एक बार फिर से उलटफेर का गवाह बनने जा रहा था. रणदीप यह मुकाबला 1,859 वोट से जीतने में कामयाब रहे. यह ओम प्रकाश चौटाला के खिलाफ उनकी दूसरी जीत थी. इस जीत के बाद रणदीप सिंह सुरजेवाला लोगों के बीच ‘शमशेर का छोरा’ की छवि को तोड़ने में कामयाब रहे. यह सूबे की सियासत में उनकी मजबूत दस्तक थी. भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया. 2007 में देश में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन किया गया. जींद की नरवाणा सीट आरक्षित श्रेणी में आ गई. रणदीप सुरजेवाला को यह सीट छोड़नी पड़ी. वो यहां से कैथल सीट पर चले गए. कैथल वो सीट जहां से उनके पिता शमशेर सुरजेवाला चुनाव लड़ते थे.

जींद के इनलो विधायक हरिचंद मिड्ढा की सीट के देहांत के बाद इस सीट पर उपचुनाव हो रहे थे. जातिगत आधार पर इस सीट पर सबसे ज्यादा समुदाय के मतदाता हैं. लेकिन 1972 को छोड़कर इस सीट पर कभी भी जाट बिरादरी का विधायक नहीं रहा. पंजाबी वैश्य समुदाय से आने वाले हरिचंद मिड्ढा पेशे से डॉक्टर थे. आस-पास के गरीब-गुरबा लोगों का मुफ्त इलाज कर दिया करते. जनता में काफी लोकप्रिय. 2009 में पहली बार इस सीट से चुनाव लड़े. इनलो की टिकट पर. बेहद कम खर्च में चुनाव लड़ा और जीता. 2014 में एक बार फिर इनलो के टिकट से चुन लिए गए. शहर में वैश्य और ब्राह्मण समुदाय के लोग मिड्ढा के पीछे लामबंद थे. आसानी से चुनाव जीत गए. मिड्ढा 10 साल से जींद के विधायक थे और सुरजेवाला 10 साल से कैथल से विधायक थे. उनका सियासी करियर एक उप चुनाव से शुरू हुआ था. 10 साल बाद वो फिर से जींद लौटे थे एक और उप चुनाव लड़ने. वैसे इससे पहले किसी मौजूदा विधायक ने विधानसभा का उप चुनाव लड़ा हो ऐसा उदहारण बहुत खोजने पर नहीं मिला.

1993 में नरवाणा उप चुनाव लड़ते वक्त रणदीप सुरजेवाला की उम्र महज 26 साल थी. इसके 26 साल बाद उन्हें 26 साल का एक नौजवान चुनौती दे रहा था. नाम दिग्विजय चौटाला. लेकिन लोगों के बीच पहचान ‘ओम प्रकाश चौटाला का पोता’ के तौर पर. लेकिन ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी का सिंबल उसके पास नहीं है. वो नई पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं. नाम ‘जन नायक जनता पार्टी’. इस उप चुनाव से पहले हरियाणा में एक एक बड़ा सियासी घटनाक्रम हुआ. यह इस उप चुनाव की पूर्वपीठिका थी.

ओम प्रकश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाले के चलते 2013 से जेल में हैं. उनके पीछे से चौटाला परिवार में उत्तराधिकार की जंग शुरू हो गई. एक तरफ ओम प्रकश चौताले के छोटे लडके अभय चौटाला हैं. दूसरी तरफ उनके पोते दुष्यंत चौटाला. दुष्यंत ने 2014 के लोकसभा चुनाव में हिसार सीट से भजन लाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई को चुनाव हराकर तहलका मचा दिया था. युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी. यही तकरार की मुख्य वजह भी बनी. दुष्यंत के बढ़ते कद ने चाचा अभय चौटाला को परेशान किया. अक्टूबर 2018. सोनीपत के गोहाना में इनलो की एक रैली हुई. दुष्यंत के समर्थकों ने नारे लगाने शुरू कर दिए, “हमारा CM कैसा हो, दुष्यंत चौटाला जैसा हो.” फरलो पर छूटकर आए ओम प्रकाश चौटाला भी मंच पर थे. दुष्यंत और उनके समर्थकों को खूब खरी-खोटी सुनाई.

चार साल चली तकरार में निर्णायक मोड़ आया 9 दिसंबर 2018 को. दुष्यंत ने जींद के पांडु पिंडारा में बड़ी रैली की. यही वो जगह थी जहां से उनके परदादा देवीलाल ने 1986 में न्याय युद्ध की शुरुआत की थी. चौटाला परिवार की विरासत इस जगह से जुड़ी हुई थी. यहां नई पार्टी की घोषणा की. ‘जननायक जनता पार्टी’. हरियाणा की राजनीति में यह शब्द देवीलाल के लिए इस्तेमाल होता आया है. दुष्यंत समर्थकों का दावा था कि रैली में पांच लाख लोग थे. यह सूबे की सियासत में नए खिलाड़ी के आने की धमक थी. नई पार्टी की घोषणा के डेढ़ महीने बाद जींद में उप चुनाव थे. दुष्यंत ने इस चुनाव में अपने छोटे भाई दिग्विजय नई पार्टी की टिकट पर मैदान में उतार दिया.

आने वाले वक्त में ये आदमी हरियाणा का मुख्यमंत्री बनेगा

25 जनवरी 2019. जींद के पटियाला चौक से दाहिनी तरफ एक रास्ता निकलता है. यहां रास्ता आगे जाकर दो भागों में बंट जाता है. एक मोड़ जींद के नरवाणा की तरफ जाता है और दूसरा कैथल की तरफ. यह रास्ता रणदीप सुरजेवाला के सियासी करियर का सटीक रूपक है. नरवाणा जाने वाली सड़क पर रणदीप सुरजेवाला की एक नुक्कड़ सभा होने वाली थी. तय कार्यक्रम के मुताबिक सुरजेवाला को यहां 5.40 पर पहुंचना था. रात के 9 बजे लोग उनका इंतजार कर रहे थे. सामने 30 के करीब प्लास्टिक की कुर्सियां रखी हुई थी. लोग कुर्सियों से कम थे.

सामने की सड़क पर कीचड़ था. कीचड़ के उस पार एक और सभा थी. जन नायक जनता पार्टी के संस्थापक दुष्यंत चौटाला पहुंचने वाले थे. उनकी सभा में भीड़ ज्यादा थी. लाउड स्पीकर पर गाने चल रहे थे. लोग नाच रहे थे. दुष्यंत सभा में पहुंचे. अपना भाषण खत्म किया और 100 मीटर आगे दूसरी सभा के लिए चल पड़े. दुष्यंत की सभा खत्म होने के बाद रणदीप सुरजेवाल के खेमे में जान दिखाई देनी शुरू हुई. लाउडस्पीकर लगाए गए. सुरजेवाला की किसी भी समय आने की घोषणा की जाने लगी. मोहल्ले के लोगों को जल्द से जल्द सभा स्थल पर पहुंचने का आग्रह किया जाने लगा. बड़े नेता के इन्तेजार में स्थानीय नेता भाषण देता है. स्थानीय नेताजी भाषण दे रहे थे. उन्होंने कहा, ‘ये आदमी, भाई रणदीप सिंह सुरजेवाला आने वाले टाइम में हरियाणा का मुख्यमंत्री हैं.”

जींद में रणदीप सुरजेवाला ने नया नारा दिया था, ‘जींद बदलेंगे, जिंदगी बदलेंगे.’ कैथल के मौजूदा विधायक जींद से उप चुनाव लड़ने का स्पष्टीकरण देने लगे. मंझे हुए प्रवक्ता की तरह ‘जींद मेरी जन्मभूमि है. मैं कैथल में बहुत खुश हूं. कोई दिक्कत नहीं है. मैं यहां आपसे आपकी तकलीफे मांगने आया हूं. मैं यहां आपसे तप मांगने आया हूं.”

रणदीप सुरजेवाला लोगों के सामने जींद और जिंदगी बदलने की बात कह रहे थे. अगले विधानसभा चुनाव में महज 6 महीने का वक़्त बचा है. यह चुनाव मुद्दों की बजाए जोर आजमाइश का अखाड़ा बना हुआ. जींद जाट हार्टलैंड का जिला है. जाट हरियाणा की सबसे बड़ी बिरादरी है. कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोक दल दोनों ही बड़े राजनीतक दल इस बिरादरी अपना दावा जताते आए हैं. रणदीप सुरजेवाला को इस सीट से उतारने के पीछे एक वजह यह भी थी. चौटाला परिवार विरासत की जंग में उलझा हुआ है. दिग्विजय की उम्मीदवारी के बाद उनके चाचा ने क्या किया?

सियासत में विरासत के झगड़े सड़को पर निपटाए जाते हैं. जिसके पीछे लोग हैं वही असली सियासी वारिस. वैसे तो चुनाव के नतीजे 31 तारीख को आने वाले हैं लेकिन ओम प्रकश चौटाला की पार्टी के लिए नतीजे पहले से साफ़ हो चुके हैं. अभय चौटाला के नेतृत्व वाली इनलो के पास इस चुनाव में उम्मीदवार तक नहीं था. जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान सक्रीय रहने वाले उमेद रेढू ने निर्दल परचा भरा था. इनलो ने बाद में इन्हें गोद में ले लिया. वो चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन लड़ाई में दिखाई नहीं दे रहे हैं.

पिछले दौर में हरियाणा में एक और राजनीतिक घटनाक्रम ऐसा था जिसका सूबे की सियासत में लंबा असर रहेगा. बीजेपी की टिकट पर कुरुक्षेत्र से जीतने वाले राजकुमार सैनी ने 2 सितंबर 2018 को अपनी नई पार्टी बना ली. नाम रखा, ‘लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी’. सैनी अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं. जाट आरक्षण आंदोलन का उन्होंने खुलकर विरोध किया था. वो सूबे में ओबीसी बिरादरियों को लामबंद करने में लगे हुए हैं. बीजेपी ने इसी फॉर्मूले के जरिए 2014 में सूबे की सत्ता हासिल की थी.सैनी ने जींद उप चुनाव में विनोद आशरी को उतार कर कांग्रेस और बीजेपी का समीकरण बिगाड़ दिया है. विनोद आशरी ब्राहमण समुदाय से आते हैं.

जींद विधानसभा क्षेत्र दो साफ़ खांचो में बंटा हुआ है. ग्रामीण इलाके जाट बाहुल्य वाले इलाके हैं. यहां कांग्रेस-जेजेपी और इनलो के बीच सियासी रस्साकशी देखने को मिल रही है. शहरी इलाके में तीन बड़ी बिरादरियां हैं पंजाबी वैश्य, अग्रवाल वैश्य और ब्राहमण. यह परंपरागत तौर पर बीजेपी का वोट बैंक माना जाता है. बीजेपी ने दिवंगत विधायक हरिचंद मिड्ढा के बेटे कृष्ण मिड्ढा को मैदान में उतारा है. मिड्ढा पंजाबी वैश्य समुदाय से आते हैं. सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी ने इस सीट से ब्राहमण उम्मीदवार उतारा है. इससे बीजेपी के परंपरागत वोट बैंक में सेंध पड़ना तय है.रही-सही कसर अरविंद केजरीवाल ने पूरी कर दी. चुनाव प्रचार खत्म होने के दो घंटे पहले उन्होंने पुरानी अनाज मंडी के पास एक जनसभा की. जेजेपी के उम्मीदवार दिग्विजय के पक्ष में. जेजेपी को उम्मीद है कि केजरीवाल की सभा से अग्रवाल वैश्य समुदाय उनके पक्ष में लामबंद होगा.

जींद का गणित उलझा हुआ है. मुकाबला कई कोणों में बंटा हुआ है. हर पार्टी के पास अपनी जीत का समीकरण है. यह एक विधानसभा सीट का उप चुनाव है लेकिन दो सूबे के मुख्यमंत्री और आधा दर्जन मंत्री चुनाव प्रचार के लिए पहुंच चुके हैं. जींद के बाहर की चार हजार गाड़ी जींद की सड़के रौंद रही हैं और जाम का सबब बनी हुई हैं. जींद के ताऊ देवीलाल चौराहे पर खड़े एक बुजुर्ग की बात के जरीए इस उप चुनाव एक लाइन में समेटा जा सकता है. वो कहते हैं, “जनता की किसको पड़ी है जी, यहां तो सबी मुख्यमंत्री बनने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं.”

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